कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥
म्हणोनि अर्जुना तोचि जाणावा । जो कर्माचां लोटीं न पाविजे विसांवा । आणि अकर्माचां ठावीं न संवावा । कर्माचिया ओढी ॥
"Therefore Arjuna, recognize him alone as wise, who finds no rest (stagnation) in the flood of actions, and is not touched by the pull of actions in the state of inaction."
💡 अर्थ
इसलिए हे अर्जुन, उसी को ज्ञानी समझना चाहिए जो कर्मों के प्रवाह में बहता नहीं और अकर्म की स्थिति में भी कर्मों के प्रति आसक्त नहीं होता।