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दो मछलियाँ और एक मेंढक

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एक विशाल तालाब में दो बड़ी मछलियाँ रहती थीं - शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि। उन्हें अपनी चतुराई पर बहुत घमंड था। उसी तालाब में एकबुद्धि नाम का एक मेंढक भी रहता था। वे तीनों अच्छे दोस्त थे। एक शाम, कुछ मछुआरों ने तालाब को देखा और कहा, "कल सुबह हम यहाँ आकर जाल डालेंगे और सारी मछलियाँ पकड़ लेंगे।"

मेंढक ने यह सुनकर अपने मित्रों से कहा, "हमें तुरंत यह तालाब छोड़ देना चाहिए।" सहस्त्रबुद्धि हँसा और बोला, "डरो मत, मुझे जाल से बचने के हज़ार तरीके पता हैं।" शतबुद्धि ने भी कहा, "मुझे भी सौ तरीके आते हैं, हम नहीं भागेंगे।" लेकिन मेंढक ने उनकी बात नहीं मानी और वह उसी समय दूसरे तालाब में चला गया।

अगली सुबह मछुआरे आए और उन्होंने जाल फैलाया। शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि ने अपनी सारी बुद्धिमानी लगाई, लेकिन वे जाल से बच नहीं पाए और पकड़े गए। मेंढक ने दूर से उन्हें जाते देखा और सोचा कि कभी-कभी बहुत अधिक सोचने से बेहतर है कि समय पर सही कदम उठाया जाए।

💡 सीख

घमंड इंसान को ले डूबता है और समय पर लिया गया फैसला ही सच्ची बुद्धिमानी है।

📝 स्पष्टीकरण (Explanation)

अपनी बुद्धि पर अत्यधिक गर्व करना और खतरे के समय केवल योजनाएँ बनाना नुकसानदेह हो सकता है। सरल सामान्य ज्ञान और समय पर लिया गया निर्णय सबसे महत्वपूर्ण होता है।

🤔 Discussion Questions

Q1 धोका असूनही दोन्ही माशांनी तलाव सोडण्यास नकार का दिला?
Ans: दोन्ही माशांना त्यांच्या बुद्धीचा खूप गर्व होता आणि त्यांना वाटले की ते त्यांच्या युक्त्यांनी कोळ्यांना फसवू शकतील.
Q2 बेडकाच्या वाचण्यावरून आपल्याला निर्णय घेण्याबद्दल काय शिकायला मिळते?
Ans: हा धडा आपल्याला शिकवतो की संकटाची चाहूल लागताच वेळेवर घेतलेला निर्णय आणि साधी बुद्धी ही अति-शहाणपणापेक्षा श्रेष्ठ असते.