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📜 इतिहास और विरासत

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई स्मृति दिवस: शौर्य और बलिदान की अमर गाथा

अजरामर क्रांतिज्वाला: झाशीच्या राणीचा गौरवशाली इतिहास

✍️ Paripath Editorial Team
📅 मंगळवार, 16 जून 2026
⏱️ 25 min
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Rani Lakshmibai leading her troops in the 1857 rebellion.

प्रस्तावना: वीरांगना लक्ष्मीबाई का शौर्य

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। 18 जून का दिन उनके बलिदान की याद दिलाता है। उन्होंने न केवल अंग्रेजों की गुलामी का विरोध किया, बल्कि नारी शक्ति की अदम्य क्षमता का परिचय भी पूरी दुनिया को कराया।

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रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की कहानियाँ आज भी स्कूल के पाठ्यक्रमों और लोकगीतों का अहम हिस्सा हैं।

प्रारंभिक जीवन और संस्कार

मणिकर्णिका (मनु) का जन्म वाराणसी में हुआ था, लेकिन उनका पालन-पोषण बिठूर में हुआ। उनके पिता मोरोपंत तांबे पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में काम करते थे। मनु को बचपन से ही शास्त्रों के साथ-साथ शस्त्रों की शिक्षा भी मिली।

विशेषताविवरण
जन्म19 नवंबर 1828 (वाराणसी)
विवाह1842 में राजा गंगाधर राव के साथ
दत्तक पुत्रदामोदर राव

अंग्रेजों से संघर्ष: हड़प नीति का विरोध

लॉर्ड डलहौजी की 'हड़प नीति' (Doctrine of Lapse) के तहत जब झांसी को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने की कोशिश की गई, तब रानी ने हथियार उठाए। उन्होंने अपनी सेना को संगठित किया और स्त्रियों की भी एक सेना बनाई, जिसे 'दुर्गा दल' कहा जाता था।

1858 में सर ह्यू रोज ने झांसी को चारों ओर से घेर लिया। रानी ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अंग्रेजों की तोपों का जवाब अपनी तोपों से दिया।

सांस्कृतिक प्रभाव और विरासत

सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियाँ - "बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी" आज भी हर भारतीय की जुबान पर है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि आत्मसम्मान के लिए लड़ना सबसे बड़ा धर्म है।