शहरी चूहा और ग्रामीण चूहा
बहुत समय पहले की बात है, एक शांत और हरे-भरे गाँव में ग्राम्य नाम का एक चूहा रहता था। वह बहुत ही सरल स्वभाव का और मेहनती था। उसका घर एक पुराने पेड़ की जड़ में था। वह रोज़ाना खेतों से अनाज के दाने और फल इकट्ठा करता था। एक दिन उसका चचेरा भाई नगरीय, जो शहर में रहता था, उससे मिलने आया। नगरीय शहर के एक बड़े बंगले में रहता था और उसे विलासितापूर्ण जीवन की आदत थी। ग्राम्य ने उसका बड़े प्रेम से स्वागत किया और उसे खाने के लिए जौ और ठंडा पानी दिया। नगरीय ने वह खाना देखा और कहा, 'भाई, तुम यह कैसा सादा भोजन करते हो? तुम मेरे साथ शहर चलो, वहाँ तुम्हें राजसी पकवान खाने को मिलेंगे।' ग्राम्य शहर देखने के लिए उत्सुक हो गया और उसके साथ चल पड़ा। जब वे शहर पहुँचे, तो ग्राम्य वहाँ की चकाचौंध देखकर दंग रह गया। नगरीय उसे एक बड़े डाइनिंग टेबल पर ले गया जहाँ केक, पनीर और मिठाइयों के ढेर लगे थे। जैसे ही ग्राम्य ने खाने के लिए मुँह खोला, अचानक दरवाज़ा ज़ोर से खुला। नगरीय चिल्लाया, 'भागो!' दोनों एक छोटे से छेद में छिप गए। ग्राम्य का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। थोड़ी देर बाद जब वे फिर से बाहर आए, तो एक बड़े कुत्ते के भौंकने की आवाज़ ने उन्हें फिर से डरा दिया। ग्राम्य समझ गया कि शहर में खाना तो अच्छा है, पर यहाँ हर पल जान का खतरा है। उसने नगरीय से कहा, 'मित्र, तुम्हें यह वैभव मुबारक हो। मैं अपने गाँव की सूखी रोटी और वहाँ की शांति में ही खुश हूँ।' यह कहकर ग्राम्य वापस अपने गाँव लौट आया।
💡 सीख
डर और संकट के बीच मिलने वाले पकवानों से शांति में मिलने वाली सूखी रोटी कहीं बेहतर है।
📝 स्पष्टीकरण (Explanation)
यह कहानी स्पष्ट करती है कि भौतिक सुख-सुविधाओं और धन का कोई मूल्य नहीं है यदि वे शांति और सुरक्षा की कीमत पर आते हैं। यह छात्रों को खतरनाक विलासिता के बजाय सुरक्षा और संतोष को महत्व देना सिखाती है।