तीतर, खरगोश और ढोंगी बिल्ली
एक घने जंगल में एक बहुत बड़ा और पुराना बरगद का पेड़ था। उस पेड़ की जड़ में बनी एक खोह में 'कपिंजल' नाम का एक तीतर रहता था। वह रोज सुबह भोजन की तलाश में बाहर जाता और शाम को घर लौट आता। एक बार जब बारिश का मौसम शुरू हुआ, तो भोजन की कमी हो गई। तीतर दूर के एक खेत में चला गया जहाँ उसे बहुत सारा अनाज मिला। वह वहाँ कई दिनों तक रुक गया। इस बीच, एक खरगोश ने उस खाली खोह को देखा और वहाँ रहने लगा। कुछ दिनों बाद जब तीतर वापस आया, तो उसने खरगोश को अपने घर में देखा। तीतर ने गुस्से में कहा, 'यह मेरा घर है, तुम यहाँ से चले जाओ।' खरगोश ने शांति से उत्तर दिया, 'घर उसका होता है जो उसमें रहता है। अब मैं यहाँ रह रहा हूँ, इसलिए यह मेरा है।' दोनों में झगड़ा होने लगा। अंत में उन्होंने तय किया कि वे किसी तीसरे के पास जाकर न्याय मांगेंगे। नदी के किनारे उन्हें एक बिल्ली दिखी जो आँखें बंद करके एक पैर पर खड़ी तपस्या कर रही थी। बिल्ली कह रही थी, 'मैंने अब शिकार करना छोड़ दिया है और मैं अहिंसा के मार्ग पर हूँ।' तीतर और खरगोश को लगा कि यह बिल्ली बहुत ज्ञानी है और इसे ही अपना न्यायाधीश बनाना चाहिए। वे बिल्ली के पास गए और अपनी समस्या बताई। बिल्ली ने धीरे से कहा, 'बच्चों, मैं बूढ़ी हो गई हूँ और मुझे ठीक से सुनाई नहीं देता। कृपया मेरे पास आकर अपनी बात कहें।' बिल्ली की बातों पर विश्वास करके तीतर और खरगोश उसके बिल्कुल पास चले गए। जैसे ही वे पास पहुँचे, बिल्ली ने झपटकर दोनों को पकड़ लिया और अपना शिकार बना लिया। इस तरह, अपने स्वाभाविक शत्रु पर विश्वास करने के कारण उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी।
💡 सीख
अपने स्वाभाविक शत्रु पर कभी विश्वास न करें, चाहे वह कितना भी धार्मिक या दयालु होने का ढोंग करे।
📝 स्पष्टीकरण (Explanation)
यह कहानी बताती है कि किसी को भी अपने स्वाभाविक शत्रु के बाहरी दिखावे से धोखा नहीं खाना चाहिए। बिल्ली ने तीतर और खरगोश को जाल में फँसाने के लिए एक संत का रूप धारण किया था। हालाँकि उनके बीच आपस में विवाद था, लेकिन एक शिकारी के प्रति उनकी सावधानी की कमी उनकी मृत्यु का कारण बनी।