व्यापारी और लोहे का तराजू
एक समय की बात है, नादुक नाम का एक व्यापारी एक शहर में रहता था। व्यापार में भारी नुकसान होने के कारण वह गरीब हो गया और उसने धन कमाने के लिए दूसरे देश जाने का फैसला किया। उसके पास एक विरासत में मिला हुआ एक हजार किलो का लोहे का तराजू था। उसने वह तराजू अपने मित्र लक्ष्मण के पास अमानत के तौर पर रख दिया और विदेश चला गया।
कई वर्षों के बाद, नादुक बहुत सारा धन कमाकर वापस लौटा। वह लक्ष्मण के पास गया और अपना तराजू वापस माँगा। लक्ष्मण के मन में लालच आ गया था। उसने झूठ बोलते हुए कहा, 'मित्र, मुझे बहुत दुख है, लेकिन जिस गोदाम में मैंने तुम्हारा तराजू रखा था, वहाँ के चूहों ने उसे पूरी तरह से खा लिया।' नादुक समझ गया कि लक्ष्मण झूठ बोल रहा है, क्योंकि चूहे लोहा नहीं खा सकते। पर उसने शांति से कहा, 'कोई बात नहीं मित्र, अगर चूहों ने उसे खा लिया है तो इसमें तुम्हारा क्या दोष।'
फिर नादुक ने लक्ष्मण से कहा, 'मैं नदी में स्नान करने जा रहा हूँ, क्या तुम अपने पुत्र रामू को मेरे साथ भेज सकते हो ताकि वह मेरे सामान की रखवाली कर सके?' लक्ष्मण ने सोचा कि नादुक उसकी बात मान गया है, इसलिए उसने खुशी-खुशी अपने बेटे को भेज दिया। नदी पर पहुँचकर नादुक ने बालक को एक गुफा में छिपा दिया और गुफा का द्वार एक बड़े पत्थर से बंद कर दिया। वह अकेला ही लक्ष्मण के घर लौटा।
लक्ष्मण ने पूछा, 'मेरा बेटा कहाँ है?' नादुक ने दुखी होने का नाटक करते हुए कहा, 'मित्र, जब मैं स्नान कर रहा था, तब एक चील ऊपर से आई और तुम्हारे बेटे को उठाकर ले गई।' लक्ष्मण चिल्लाया, 'यह नामुमकिन है! एक चील इतने बड़े बच्चे को कैसे उठा सकती है?' नादुक ने मुस्कुराकर कहा, 'मित्र, अगर चूहे हजार किलो का लोहा खा सकते हैं, तो चील भी एक बच्चे को उठा सकती है।' लक्ष्मण को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने नादुक से माफी माँगी और उसका तराजू लौटा दिया। नादुक ने भी उसके बेटे को सही-सलामत वापस कर दिया।
💡 सीख
जैसे को तैसा। (धोखेबाज के साथ उसी की भाषा में व्यवहार करना चाहिए।)
📝 स्पष्टीकरण (Explanation)
यह कहानी 'जैसे को तैसा' के सिद्धांत को सिखाती है। जब लक्ष्मण ने एक असंभव बहाने से नादुक को धोखा देने की कोशिश की, तो नादुक ने उसी तर्क का उपयोग करके उसे दिखाया कि उसका झूठ कितना हास्यास्पद था। यह स्पष्ट करता है कि बेईमानी का मुकाबला करने के लिए बुद्धि और चतुराई का उपयोग किया जा सकता है।