कपटी बगुला और बुद्धिमान केकड़ा
एक विशाल तालाब के किनारे एक बूढ़ा बगुला रहता था। बूढ़ा होने के कारण वह अब पहले की तरह फुर्ती से मछलियाँ नहीं पकड़ पाता था। वह कई दिनों तक भूखा रहने लगा। अंत में, उसने अपनी भूख मिटाने के लिए एक धूर्त योजना बनाई। वह तालाब के किनारे बहुत उदास चेहरा बनाकर खड़ा हो गया। उसे देखकर तालाब की मछलियाँ, मेंढक और एक बड़ा केकड़ा उसके पास आए। उन्होंने पूछा, 'बगुला मामा, आज आप शिकार क्यों नहीं कर रहे? और इतने उदास क्यों हैं?' बगुले ने झूठे आँसू बहाते हुए कहा, 'क्या बताऊं दोस्तों, मैंने एक ज्योतिषी से सुना है कि इस क्षेत्र में अगले बारह वर्षों तक बारिश नहीं होगी। यह तालाब जल्द ही सूख जाएगा। मुझे आप सबकी चिंता हो रही है।' यह सुनकर सभी जलचर डर गए। उन्होंने बगुले से पूछा, 'अब हमें क्या करना चाहिए?' बगुले ने उत्तर दिया, 'मैं पास ही एक बड़ी और गहरी झील जानता हूँ जिसमें बहुत पानी है। यदि आप मुझ पर विश्वास करें, तो मैं आपको एक-एक करके वहाँ ले जा सकता हूँ।' मछलियाँ तैयार हो गईं। बगुला हर दिन एक मछली को अपनी चोंच में दबाकर उड़ जाता। लेकिन वह उन्हें दूसरी झील में ले जाने के बजाय एक बड़ी चट्टान पर ले जाकर खा जाता था। कुछ दिनों बाद केकड़े ने पूछा, 'मामा, आज मेरी बारी लगा दो।' बगुले ने सोचा कि रोज मछलियाँ खाकर बोर हो गया हूँ, आज केकड़ा खाकर देखता हूँ। बगुला केकड़े को लेकर उड़ने लगा। उड़ते समय केकड़े को नीचे जमीन पर हड्डियों का ढेर दिखाई दिया। उसे तुरंत समझ आ गया कि बगुला उन्हें धोखा देकर मार रहा है। केकड़े ने अपने नुकीले पंजों से बगुले की गर्दन पकड़ ली और उसे मार डाला। केकड़ा वापस तालाब में गया और सबको बगुले के छल के बारे में बताया। सबने केकड़े की बुद्धिमानी के लिए उसका धन्यवाद किया।
💡 सीख
छल का अंत बुरा होता है और सूझबूझ से संकट को टाला जा सकता है।
📝 स्पष्टीकरण (Explanation)
यह कहानी हमें सिखाती है कि हमें दूसरों पर अंधा विश्वास नहीं करना चाहिए, खासकर उन पर जिनका हमें नुकसान पहुँचाने का स्वार्थ हो सकता है। यह यह भी दर्शाती है कि संकट के समय सूझबूझ और बुद्धिमानी से काम लेने पर जान बचाई जा सकती है।