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📜 इतिहास और विरासत

स्वराज्य की जननी: राजमाता जिजाबाई पुण्यतिथि - एक महान प्रेरणा

स्वराज्याची प्रेरणा आणि छत्रपती शिवरायांच्या आदर्श मातेस अभिवादन

✍️ Paripath Blog Editorial Team
📅 मंगळवार, 16 जून 2026
⏱️ 15 min
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The Samadhi of Rajmata Jijabai at Pachad, Maharashtra

प्रस्तावना: स्वराज्य की प्रेरणास्त्रोत राजमाता जिजाबाई

भारतीय इतिहास के पन्नों में राजमाता जिजाबाई का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। हर वर्ष १७ जून को उनकी पुण्यतिथि मनाई जाती है। वे केवल छत्रपती शिवाजी महाराज की माता ही नहीं, बल्कि हिंदवी स्वराज्य की मुख्य वास्तुकार और मार्गदर्शक थीं। उनके जीवन का हर क्षण राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान की मिसाल है।

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राजमाता जिजाबाई का जीवन भारतीय नारी शक्ति और बुद्धिमत्ता का सर्वोच्च उदाहरण है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: अत्याचारों का युग

१७वीं शताब्दी में जब संपूर्ण भारत विदेशी आक्रांताओं और दक्षिण की सल्तनतों के अत्याचारों से त्रस्त था, तब जिजाबाई ने एक स्वतंत्र राज्य का स्वप्न देखा। उनका जन्म १५९८ में सिंधखेड़ राजा के शक्तिशाली सरदार लखुजी जाधव के घर हुआ था। वैभवशाली जीवन होने के बावजूद उन्होंने स्वदेश और स्वधर्म की रक्षा को प्राथमिकता दी।

जीवन के महत्वपूर्ण मील के पत्थर

वर्षघटनामहत्व
१५९८जन्म (सिंधखेड़ राजा)एक वीर और प्रतिष्ठित परिवार में आगमन।
१६०५शहाजी राजे भोंसले से विवाहभोंसले और जाधव परिवारों का मिलन।
१६३०शिवजी महाराज का जन्मस्वराज्य के संकल्प की नींव।

प्रशासनिक कुशलता और शिक्षा

जिजाबाई ने पुणे की जागीर का प्रबंधन उस समय संभाला जब वह पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी थी। उन्होंने किसानों को सुरक्षा का वचन दिया और कृषि को पुनर्जीवित करने के लिए सोने का हल चलवाया। उन्होंने शिवाजी महाराज को राजनीति, युद्ध कौशल और न्याय के सिद्धांतों की शिक्षा दी।

"स्वराज्य केवल भूमि का टुकड़ा नहीं, बल्कि धर्म और न्याय की स्थापना है।" - जिजाबाई की सीख।
शिवाजी को महान चरित्र और साहस की कहानियां सुनाकर एक नायक बनाया।

न्याय और समाज सुधार

जिजाबाई के दरबार में न्याय की देवी का निवास माना जाता था। उन्होंने छुआछूत और भेदभाव के खिलाफ काम किया और समाज के हर वर्ग को स्वराज्य के कार्य में जोड़ा। उनकी पंचायत प्रणाली ने ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाया।

  • न्यायप्रियता: बिना किसी पक्षपात के अपराधी को दंड देना।
  • जनहित: कुओं, तालाबों और मंदिरों का जीर्णोद्धार।
  • नैतिकता: सेना के लिए सख्त नियम बनाना ताकि आम जनता को कष्ट न हो।

अंतिम समय: पाचाड और समाधि

६ जून १६७४ को शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ और जिजाबाई की आंखों के सामने 'स्वराज्य' का सपना साकार हुआ। राज्याभिषेक के मात्र ११ दिन बाद, १७ जून १६७४ को पाचाड में उन्होंने अपनी देह त्याग दी। उनकी समाधि आज भी हमें राष्ट्र सेवा की प्रेरणा देती है।

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राजमाता जिजाबाई की जीवनी हर छात्र के लिए अनिवार्य पाठ्यक्रम होनी चाहिए ताकि वे नेतृत्व के गुणों को सीख सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न